दो ध्रुवीयता का अंत
दो ध्रुवीयता का अंत 20वीं शताब्दी के विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है, जो शीत युद्ध की समाप्ति के साथ जुड़ी हुई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख ध्रुवों – अमेरिका और सोवियत संघ – में बंट गया था। यह स्थिति दो ध्रुवीयता (Bipolarity) कहलाती थी, जहां दुनिया की राजनीति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था इन दो महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती थी। परंतु 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही यह दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई, जिसे हम “दो ध्रुवीयता का अंत” कहते हैं। इसका प्रभाव वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विकासशील देशों की नीतियों पर स्पष्ट रूप से देखा गया। इस ऐतिहासिक परिवर्तन ने एक एकध्रुवीय विश्व (Unipolar World) की शुरुआत की, जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। यह विषय समकालीन राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सोवियत संघ का गठन
- 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति के बाद समाजवादी सोवियत गणराज्य संघ (U.S.S.R. ) अस्तित्व में आया इसे ही सोवियत संघ के नाम से जाना गया
- सोवियत संघ में कुल मिलाकर 15 गणराज्य थे यानी 15 अलग-अलग देशों को मिलाकर सोवियत संघ का निर्माण किया गया था
- इन सभी देशो की विचारधारा साम्यवादी थी
- सोवियत संघ के प्रथम राष्ट्रपति व्लादिमीर लेनिन थे तथा अंतिम राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव थे
- सोवियत संघ व अन्य ऐसे देश जिनकी विचारधारा साम्यवादी थी उन्हें दूसरी दुनिया के देश कहा गया
- साम्यवादी देशो ने 1955 में एक सैन्य गठबंधन किया जिसे वारसा पैक्ट कहा गया
- दिसंबर 1991 में मिखाइल गोर्बाचेव ने इस्तीफा दे दिया और औपचारिक रूप से सोवियत संघ का विघटन हो गया
🛡️ सोवियत प्रणाली का विघटन और दो ध्रुवीयता का अंत
सोवियत संघ ने अपने विकास के लिए जो प्रणाली अपने उसे सोवियत प्रणाली के नाम से जाना गया | सोवियत प्रणाली पूर्ण रूप से समाजवाद व् साम्यवाद पर आधारित थी इस प्रणाली का निर्माण श्रमिक वर्ग को ध्यान में रख कर किया गया था विकास का ये मॉडल आर्थिक रूप से सफल नहीं हो पाया लेकिन राजनैतिक रूप से अभी भी विश्व के बहुत से देशो में ये प्रणाली देखने को मिलती है
साम्यवादी सोवियत संघ की प्रमुख विशेषताएँ
- उत्पादन और वितरण पर सरकारी नियंत्रण
- प्रतियोगिता का आभाव
- कीमतों पर सरकारी नियंत्रण
- सीमित स्वतंत्रताएँ
- एक दल का नियंत्रण
- बेरोज़गारी न के बराबर
दोष
- लोकतंत्र का आभाव
- भ्र्ष्टाचार
- निजी सम्पति का आभाव
- गुणवत्ता और प्रतियोगिता का आभाव
- स्वतंत्रता का अभाव
- सोवियत अर्थव्यवस्था की विफलता (कमियाँ)
साम्यवादी सोवियत अर्थव्यवस्था तथा पूँजीवादी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अंतर :-
| सोवियत अर्थव्यवस्था | अमेरिका की अर्थव्यवस्था |
| (i) राज्य द्वारा पूर्ण रूप से नियंत्रित | (i) राज्य का न्यूनतम हस्तक्षेप |
| (ii) योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था | (ii) स्वतंत्र आर्थिक प्रतियोगिता पर आधारित |
| (iii) निजी संपत्ति का अभाव | (iii) पूर्ण रूप से निजीकरण |
| (iv) समाजवादी आदर्शो से प्रेरित | (iv) अधिकतम लाभ के पूंजीवादी सिद्धांत । |
| (v) उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व | (v) उत्पादन के साधनों पर बाजार का नियंत्रण । |
मिखाईल गोर्वाचेव की नीतियाँ
मिखाईल गोर्वाचेव 1985, मे सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने उन्होंने सोवियत संघ मे सुधार के लिए ग्लासनोस्त्र (खुलापन) और प्रेस्त्रोइका (पुनर्गठन) की नीति को अपनाया इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य लिए गए।
- ग्लासनोस्त्र (खुलापन)
- सोवियत संघ में लोगों को अपनी इच्छानुसार “दल बनाने की स्वतंत्रता दी गई
- साम्यवादी दल का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।
- रेडियो टी. वी., समाचार पत्र आदि संचार के साधनो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया और लोगो को विचार अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता दी गई।
- सोवियत संघ मे लोगों को निजी सम्पति रखने का अधिकार दे दिया गया।
- अर्थव्यवस्था से सरकारी नियंत्रण समाप्त कर दिया गया।
- सोवियत संघ मे निजी उद्योग स्थापित करने की स्वतंत्रता दी गई है।
- प्रेस्त्रोइका( पुर्नगठन):-
- सोवियत संघ में सम्मलित राज्यो को वार्सा पैक्ट में बने रहने या अलग रहने की स्वतंत्रता दी गई है।
- ‘राज्यो को अपनी इच्छानुसार नीतियो का निर्माण करने का अधिकार दे दिया गया।
- सोवियत संघ में सम्मलित राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार दे दिया गया।
सोवियत संघ के विघटन के कारण
- राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों की आंतरिक कमजोरियाँ: सोवियत राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों की आंतरिक कमजोरियाँ लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहीं।
- अर्थव्यवस्था का स्थिर हो जाना:सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था स्थिर हो गई। सोवियत अर्थव्यवस्था ने अपने अधिकांश संसाधनों का उपयोग परमाणु और सैन्य शस्त्रागार को बनाए रखने में किया।
- भ्रष्टाचार: सोवियत संघ भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, सरकार में अधिक खुलेपन की अनुमति देने की अनिच्छा और एक विशाल भूमि में अधिकार के केंद्रीकरण के कारण स्थिर हो गया
- राष्ट्रवाद का उदय:यूएसएसआर के पतन का एक अन्य कारण राष्ट्रवाद का उदय और रूस और बाल्टिक गणराज्यों सहित विभिन्न गणराज्यों के भीतर संप्रभुता की इच्छा थी
- पश्चिमी देशो से पिछड़ जाना
- रूस की प्रमुखता
- मिखाईल गोर्वाचेव की नीतियाँ
सोवियत संघ के विघटन के परिणाम
- शीत युद्ध की समाप्ति
- अमेरिकी वर्चस्व की शुरुआत
- हथियारों की होड़ की समाप्ति
- सोवियत संघ का अंत
- 15 नए देशो का उदय
- दूसरी दुनिया का पतन
शॉक थेरेपी की नीति और दो ध्रुवीयता का अंत के बाद वैश्विक प्रभाव
- शॉक थेरेपी का अर्थ है आघात लगाकर उपचार करना
- सोवियत संघ के विघटन के बाद साम्यवादी देशो में पूंजीवाद लाने के लिए विश्व बैंक व् अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा तैयार किया गया मॉडल शॉक थेरेपी कहलाता है
शॉक थेरेपी की विशेषताएँ
- राज्य की सम्पदा का निजीकरण
- मुक्त व्यपार को अपनाना
- पश्चिमी देशो की अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ना
- मुद्रा का आपसी परिवर्तन
शॉक थेरेपी के परिणाम
- 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कम्पनियों को कम ( औने – पौने ) दामों में बेचा गया जिसे इतिहास की सबसे बड़ी गराज सेल कहा जाता है
- रूसी मुद्रा रूबल में गिरावट
- आर्थिक असमानता बढ़ी
- कृषि के निजीकरण से खाद्य सुरक्षा समाप्त
🌐 दो ध्रुवीयता का अंत और एक ध्रुवीय विश्व की शुरुआत
| v 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध का अंत हो गया तथा अमेरिकी वर्चस्व की स्थापना के साथ विश्व राजनीति का स्वरूप एक – ध्रुवीय हो गया ।
v अगस्त 1990 में इराक ने अपने पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया । संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विवाद के समाधान के लिए अमरीका को इराक के विरूद्ध सैन्य बल प्रयोग की अनुमति दे दी । संयुक्त राष्ट्र संघ का यह नाटकीय फैसला था । अमेरिका राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इसे नई विश्व व्यवस्था की संज्ञा दी । v अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन लगातार दो कार्यकालों ( जनवरी 1993 से जनवरी 2001 ) तक राष्ट्रपति पद पर रहे । इन्होंने अमेरिका को घरेलू रूप से अधिक मजबूत किया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा जलवायु परिवर्तन तथा विश्व व्यापार जैसे नरम मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित किया । source supporting material |
अन्य बिंदु
- विश्व में एक महाशक्ति का होना ।
- 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय विश्व की स्थापना हुई।
- विश्व में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का बोलबाला हो गया क्योकि समाजवादी अर्थव्यवस्था असफल हो गयी ।
- अमेरिका का सैन्य खर्च और सैन्य प्रौद्योगिकी की गुणवत्ता का इतना अच्छा होना की विश्व में कोई भी देश उसको चुनौती नहीं दे सकता है
- अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संघटनो पर भी अमेरिकी वर्चस्व स्थापित हो गया
- अमेरिका की जींस , कोक , पेप्सी आदि विश्व भर की संस्कृतियों पर हावी हो गए
अफगानिस्तान
| अतिरिक्त जानकारी
अफगानिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था © अफगानिस्तान विश्व युद्ध एवं शीतयुद्ध दोनों से अलग रहा © 1960 में अफगानिस्तान के राजा जाहिर शाह द्वारा कुछ राजनीतिक बदलाव किए गए © अफगानिस्तान में चुनाव कराए गए © लोगों को राजनीतिक अधिकार दिए गए © स्त्री शिक्षा पर जोर दिया गया © 1973 में राजा के चचेरे भाई दाऊद खान ने उन्हें हटा दिया और वह खुद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन गए समाजवादी हस्तक्षेप © 5 साल बाद यानी 1978 में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान (PDPA) ने दाऊद खान की सरकार का तख्तापलट कर दिया © PDPA एक समाजवादी पार्टी थी © इन्होंने भूमि सुधार प्रक्रिया के तहत ऐसे लोगों से जमीन लेना शुरू कर दिया जिनके पास बहुत ज्यादा जमीन थी और इस जमीन को उन लोगों में बांटने लगे जिनके पास जमीन नहीं थी © इस वजह से अफगानिस्तान के गांव के लोग सरकार से नाराज हो गए © लोगों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया © सरकार द्वारा इस विद्रोह को दबाने की कोशिश की गई पर वह इसमें कामयाब नहीं हुए
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महत्वपूर्ण जानकारी
USSR और अफगानिस्तान
- अफगानिस्तान में बनी समाजवादी सरकार ने सोवियत संघ से मदद मांगी और सोवियत संघ ने इनकी मदद करते हुए उन्हें हथियार और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई
- फिर भी लोगों के विद्रोह पर काबू नहीं पाया जा सका
- व्यवस्था को खराब होते हुए देखकर 1979 में सोवियत संघ ने अपनी सेना अफगानिस्तान में भेजी इसी को अफ़ग़ान संकट के नाम से जाना गया
- 34 मुस्लिम देशों और संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान में भेजे जाने का विरोध किया गया
- पर सोवियत संघ ने किसी की भी नहीं सुनी और उसने अफगानिस्तान के शहरों और वहां की संचार व्यवस्था पर पूरा कब्जा कर लिया
अफगानिस्तान संकट (1979-89)
- इस दौरान अफगानिस्तान के लोगों और सोवियत संघ की सेना के बीच युद्ध शुरू हो गया और अफगानिस्तान के लोगो ने इसे धर्म युद्ध का नाम दिया
- अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के लोगों का समर्थन किया गया और इस तरह से दोनों महाशक्तियां अफगानिस्तान युद्ध में आमने-सामने आ गई
- ओसामा बिन लादेन भी इस युद्ध में शामिल था और इसी युद्ध से तालिबान और अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों की शुरुआत हुई
अफगानिस्तान युद्ध की समाप्ति
- 1985 में गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने और उन्होंने सोवियत संघ की व्यवस्था में बदलाव लाने शुरू किए
- इसी दौरान उन्होंने अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाया और 1989 तक सोवियत सेना पूरी तरह से अफगानिस्तान से बाहर आ चुकी थी
- इस तरह अफगानिस्तान युद्ध का अंत हुआ
अफगानिस्तान युद्ध की समाप्ति के बाद
- USSR की सेना के बाहर जाने के बाद भी अफगानिस्तान की समस्या खत्म नहीं हुई वहां पर गृह युद्ध शुरू हो गया उन्हीं सब आतंकवादी गुटों के बीच जो इस दौरान विकसित हुए थे जैसे कि अलकायदा तालिबान और अन्य गुट
- 1994 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने सरकार बनाई ये सरकार 2001 तक चली
- 2001 में 9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और तालिबान की सरकार गिर गई
- 2001 से 2021 तक अमेरिकी सेना की सहायता से अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के पसंद की सरकार रही
- 2021 में अमेरिका की सेना वापस चली गई सेना के जाते ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण कर लिया
- वर्तमान में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार है
खाड़ी युद्ध
- 1990 में इराक ने कुवैत पर कब्जा कर लिया
- इराक को समझाने की कोशिश की गई पर इराक नहीं माना
- इस दौरान UNO ने इराक पर बल प्रयोग करने की अनुमति दी
- इस सैन्य अभियान को नाम दिया गया ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म
- UNO की सेना को इराक पर हमला करने के लिए भेजा गया। ये सेना वैसे तो 34 देशो की मिली जुली सेना थी
- इस युद्ध में 6 लाख 60 हज़ार पैदल सैनिको ने भाग लिया जिनमे 75% सैनिक अमेरिका के थे। इस सेना के जरनल भी अमेरिकी थे।
- सद्दाम हुसैन जो उस समय इराक के राष्ट्रपति थे उन्होंने कहा की यह जंग सौ जंगो की एक जंग होगी मतलब की उन्हें हराना बहुत मुश्किल होगा पर ऐसा कुछ हुआ नहीं और इराक बड़े ही आराम से कुछ ही दिनों में हार गया और उसे कुवैत से हटना पड़ा।
- इस युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपनी शक्तियों का खुला प्रदर्शन किया।
- इस युद्ध में अमेरिका ने स्मार्ट बमो का प्रयोग किया इसीलिए इसे कंप्यूटर युद्ध भी कहा जाता है
- साथ ही साथ इस युद्ध का टीवी पर लाइव प्रसारण किया गया जिस वजह से इसे वीडियो गेम वॉर कहा गया।
- UNO द्वारा लिए गए इस फैसले को नाटकीय इसीलिए कहा गया क्योकि इससे पहले कभी भी UNO द्वारा कोई इस तरह का निर्णय नहीं लिया गया था।
अरब स्प्रिंग
- 21 वीं शताब्दी में पश्चिम एशियाई देशों में लोकतंत्र के लिए विरोध प्रदर्शन और जन आंदोलन शुरू हुए। इन्ही आंदोलन को अरब स्प्रिंग के नाम से जाना जाता है।
- इसकी शुरुआत ट्यूनीशिया में 2010 में मोहम्मद बउज़िज़ी के आत्मदाह के साथ हुई।
अरब क्रांति के कारण
- भ्रष्टाचार
- गरीबी
- बेरोज़गारी
- तानाशाही
- जनता का असंतोष
- मानव अधिकार उल्लंघन
क्रांति की शुरुआतv अरब क्रांति की शुरुआत मोहम्मद बाउजीजी नामक एक गरीब व्यक्ति के आत्मदाह करने की वजह से हुई v दिसंबर 2010 को बाउजीजी की ट्यूनीशिया की पुलिस के साथ झड़प हो गयी v पुलिस ने इनके फल और इनका सामान छीन लिया और उनकी बेइज्जती की और साथ ही साथ मारा भी v इन सब चीजों की वजह से वह बहुत ज्यादा दुखी हो गए और गुस्से में आकर उन्होंने अपने ऊपर केरोसिन छिड़क लिया और खुद को आग लगाकर आत्मदाह कर लिया v आत्मदाह करते वक्त उनके भाई ने इस घटना का वीडियो बना लिया और यह वीडियो फेसबुक की वजह से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया v 4 जनवरी 2011 को इनकी मृत्यु हो गई v मोहम्मद बाउजीजी की मृत्यु के बाद कोई भी कड़े कदम नहीं उठाएं गए इसी वजह से लोगों का गुस्सा और ज्यादा बढ़ा v मोहम्मद बाउजीजी की मृत्यु के बाद ट्यूनीशिया में लोगों ने भारी संख्या में विरोध करना शुरू कर दिया v विरोध को दबाने के लिए वहां की सरकार द्वारा उन पर गोलियां भी चलवा दी गई ताकि लोग डर कर शांति से बैठ जाए पर ऐसा नहीं हुआ v विरोध के बढ़ने की वजह से वहां पर कर्फ्यू लगा दिया गया और बाद में आपातकाल भी लागू किया गया v अंत में बेन अली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और बेन अली का शासन खत्म हो गया |
“ट्यूनीशिया में आंदोलन के सफल होने के बाद धीरे-धीरे आंदोलन पूरे उत्तरी अफ्रीका और अरब देशों में फैल गया जिसे अरब क्रांति के नाम से जाना गया”
| CBSE Reference Material
अरब स्प्रिंग ( अरब क्रांति ) : 21 वीं शताब्दी में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं तथा पश्चिम एशियाई देशों में लोकतांत्रिकरण के लिए नए विकास का उदय हुआ । इस प्रकार की एक परिघटना को अरब स्प्रिंग के रूप में जाना जाता है जिसका आरंभ 2009 में हुआ ट्यूनीशिया में प्रारंभ हुए अरब स्प्रिंग ने अपनी जड़े जमा ली जहां जनता द्वारा भ्रष्टाचार , बेरोजगारी तथा निर्धनता के विरूद्ध संघर्ष प्रारंभ किया गया यह संघर्ष एक राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया क्योंकि जनता तत्कालीन समस्याओं को निरंकुश तानाशाही का परिणाम मानती थी । टयूनीशिया में उचित लोकतंत्र की मांग पश्चिम एशिया के मुस्लिम बहुल अरब देशों में फैल गई । होस्नी मुबारक , जो 1979 के पश्चात में मिस्र में सत्ता में थे , एक बड़े स्तर पर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के परिणाम स्वरूप ध्वस्त हो गए । इसके अतिरिक्त अरब क्रांति का प्रभाव यमन , बहरीन , लीबिया तथा सीरिया जैसे अरब देशों में भी देखा गया जहां जनता द्वारा इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन ने पूरे क्षेत्र में लोकतांत्रिक जागृति को जन्म दिया |
Commonwealth of Independent States (CIS)
(स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल)
स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (सीआईएस), रूसी सोद्रुज़ेस्टो नेज़ाविसिमीख गोसुदरस्टव, संप्रभु राज्यों का मुक्त संघ जो 1991 में रूस और 11 अन्य गणराज्यों द्वारा गठित किया गया था जो पूर्व में सोवियत संघ का हिस्सा थे। स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (सीआईएस) की उत्पत्ति 8 दिसंबर, 1991 को हुई थी, जब रूस, यूक्रेन और बेलारूस (बेलोरूसिया) के निर्वाचित नेताओं ने सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक (यूएसएसआर) के ढहते संघ को बदलने के लिए एक नए संघ के गठन के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया-ने नए संगठन में शामिल होने से इनकार कर दिया।
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